तुम नौकरी नहीं....
तुम नौकरी नहीं , पर तुम्हारे बिना बेरोजगार सा हूँ , रोज सोचता हूँ आज घर जाकर मैं क्या करूँ, सोते वक्त तुम्हे देखने की जो आदत थी , सही या गलत उस आदत का मैं क्या करूं , तुम नौकरी नहीं , पर तुम्हारे बिना बेरोगार सा हूँ, रोज सोचता हूँ घर जाकर मैं क्या करूँ क्यो अटक गई तुम थोड़ा और बन जाता आगे के किस्से मुझसे कह देती , मैं सुनाता , कभी हंसाता कभी रुलाता , थोड़ा गुद - गुदाता कम से कम पूरा हो जाता , अब जो चुप हो तुम , तो खामोश मैं भी हूँ । अधूरी हो तुम अधूरा मैं भी हूँ , पर क्योंकि तुम नौकरी नहीं पर तुम्हारे बिना मैं बेरोजगार सा हूँ तुम्हे फिर एक बार पढूँगा और जो रह गया अधूरा उसे पूरा करूँगा , क्योकि तुम नौकरी नहीं पर तुम्हारे बिना मैं बेरोजगार सा हूँ ।
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