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अश्को को मेरे तेल समझ दिया जला दिया, लहू को मेरे मरहम समझ जख्म पर लगा दिया। बेइंतहा फिक्र करते थे उनकी शाम- ओ-शहर, उसने हमारी परवाह का भी दाम लगा दिया। इश्क़ मे नही निभा सके वो वादा-ए-मोहब्बत, और बेवफा का इल्जाम हम पर ही लगा दिया। मोहब्बत करके दिल तोड़ गया वो मतलबी, फिर दोस्ती का नाम देकर एहसान जता दिया। वो क्या समझेगा मेरी कविता, ग़ज़ल, शायरी को, कागज पे उतरे अल्फाज को जज्बात बता गया।
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