गुजरते दिन बदलते लोग
दुनिया की किताब पढ़ी नही जाती जमाना है सीखा देता, लगता है बड़ा उस्ताद मतलब की बात बता देता, गुजरते दिन बदलते लोग हैं। पला गोद में कभी, खड़ा आंगन में था जब तक गमले में था, होती रोज पूजा थी आज निकला गमले से तो कहता मैंने कर्म किया, सींचा माली न होता , तो होता पेड़ कैसे क्या कहें, गुजरते दिन बदलते लोग हैं। यह देखकर बूढ़े पेड़ के मन में ख्याल आया, लगती पानी भी बोझ है जब बारिश अथाह हो, सब तारीफे पुल बांधे, बूढ़ा बांधे अपने यार की बांध न सका उस उगाए पौधे का, क्या कहें गुजरते दिन बदलते लोग। कटते पेड़ से तो बहाना भी बनाया न जाता महफिल छोड़ दिया , पर सच तक छूटी न, उगते पेड़ ने आहत न की, लगता न था कि, आदत बड़ी तनख्वाह सी है, पता नहीं गुजरते दिन बदलते लोग हैं। ये सोच कर कटवा दिया पेड़ आंगन में मेरे होकर देता छाया पड़ोसी को। अक्ल आती भी कैसे उगते ही सोच लिया था, अनन्त हु बूढ़ा तो हो हूंगा नहीं न गुजरेगी मुझ पे , जो गुजरे उस बूढ़े मेरे आराध्या पे।
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