मैं और समाज..
न मैं एक जाति का हूं, न एक पार्टी का — मैं संबंधित हूं समाज से, उसके विवेक से, उसकी टूटती उम्मीदों और उभरते स्वप्नों से। मैं उस हर व्यक्ति के साथ हूं जो अन्याय के विरुद्ध खड़ा होता है, जो परिवर्तन लाता है – नारे से नहीं, उदाहरण से। अगर वो परिवर्तन समाज के हित में है — तो मैं उसकी ढाल हूं, और अगर वो स्वार्थ में लिप्त है — तो मैं उसका काल हूं। मैं प्रश्न हूं उस व्यवस्था पर जो आंख मूंद लेती है, और उत्तर हूं उन जनों का जो सड़कों पर उतरते हैं। मैं किताबों के अक्षरों में नहीं, अधिकारों की लड़ाई में धड़कता हूं। मेरी निष्ठा न धर्म में है, न दल में — मेरी निष्ठा उस विचार में है जो इंसान को इंसान की तरह जीने दे। मैं उस ख़ामोशी की चीख हूं, जिसे सदियों से दबाया गया, और उस उम्मीद की लौ, जो तानाशाही रात में भी जलती रहती है। मैं क्रांति का शंखनाद नहीं, बल्कि उसके पीछे की पीड़ा हूं, जो हर उस दिल में पलती है जो कुछ बदलना चाहता है। मैं आंधी हूं — जो थकान भी सुखा देती है, और खोखली दीवारें भी गिरा देती है। मेरे शब्दों में चिंगारी है, मेरी चुप्पी में विद्रोह। मैं नायक नहीं हूं, पर बदलाव की भूमिका में हूं। क्योंकि समाज तब तक नहीं बदलता जब तक कोई अपनी पहचान से ऊपर उठकर समाज की पहचान न बन जाए। मैं बिक नहीं सकता, झुक नहीं सकता, क्योंकि मेरा मूल्य समाज की चेतना है। मैं उस प्रश्न का उत्तर हूं — 'क्या अब भी कुछ बदलेगा?' और मैं खुद से कहता हूं — हाँ, बदलेगा — अगर मैं पीछे न हटूं तुम पीछे न हटो....
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