जीवन
अभी भी किनारा, न आता नज़र है चले थे जहां से वही तक मगर है सफ़र में जो कस्ती,भंवर से उलझती वहीं जलजलों का। बनी रहगुज़र है अभी भी किनारा, न आता नज़र है ये दरिया ,ये चश्म ए आब की कहानी उछलता वहीं है,जो अंजान ए लहर है है करती शिकायत ,सफ़ीना शज़र से मुझे थाम लो जहां,साहिल का घर है अभी भी किनारा, न आता नज़र है ये दुनियां बड़ी मतलबों में सनी है है फिर भी ठिकाना,यही सबका घर है न रिश्ते बिगाड़ो,न छोड़ो अकेला है छोटी ये सांसे, और छोटा सफर है अभी भी किनारा, न आता नज़र है राजीव
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