अल्फ़ाज़ और ख़ामोशी
अब ज़ाया नहीं करने अपने अल्फ़ाज़ किसी के लिए, ख़ामोश रहकर देखना है, समझता कौन है। जो ख़ामोशी समझ ले, उनपे मुक़द्दर की मंज़िल तक का साथ है, जो सिर्फ़ दिखावे में अपनापन जताए, उनके लिए अलविदा आज है।🤍
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