नारी आओ बोलो
वही रात, वही रास्ता , पर नजरिए अलग है! लडका थका हारा-बेचारा , ल़डकि का चरित्र अलग है! वो दफ्तर से देर से आए , तो नींद उसकी जिम्मेदारी है ! ल़डकि आराम मांगे , तो खुदगरजी भारी है ! बर्षों से एक चित्र खडा है , विष्णु और लक्ष्मी का ! पैर दबाती स्त्री , और आराम देखो पुरुष का ! बहलाया फुसलाया सबने कन्या को अंधी कर , चंडी कह कर पूजा किया और बिठा दिया मंडी पर ! शिव के तीन नयन सोने दो , अपने दो तो खोलो ! नारी आओ बोलो ! बर्षों से जो बंद पड़े हैं उन नयन को खोलो, नारी आओ बोलो!
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