हां हां सब ठीक है!!
रह रह कर चांदनी रातों में आंखों का पानी बह सा जाता है सागर की लहरों सा मन हिचकोले खाता है। नींद बनी पड़ी है दुश्मन व्याकुल सा है मन चंचल सो सकूं जहां जरा सा नहीं है कोई ऐसा आंचल। टिमटिमाती रातों में जुगनू तारे सब गिन लेता सूनी बाहों को अब है लगता न आनी ऐसी बेला। वो पूछती हैं हमसे रूठे तो कहीं नहीं!! चंचल चितवन धीर पुरुष कि भी आभा है तब डोली जब न मिले प्रेयसी के नयनों की जो मीठी गोली। स्नेह वसित पुष्पांचल में करुण क्रंदन सा है होता धर धैर्य धरा का गंभीर पुरुष भी है रोता। अब कैसे कहें उनसे की कोई बात नहीं बस कुछ दिनों से अपनी हुई *स्नेह सिंचित* बात नहीं!!
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