प्रेम कुछ ऐसा हो
प्रेम कुछ ऐसा हो... मेरी चंचल सी नादानियों में, तुम्हारी गहरी सी समझ हो, भीड़ भरी इस दुनिया में, तुम एक मुकम्मल नज़्म हो। मैं ज़िद पर अड़ जाऊँ कभी, तुम हाथ थाम कर समझाना, मैं भटकूँ अगर राहों में, तुम मेरा घर बन जाना। प्रेम कुछ ऐसा हो, जो लफ्जों से ज्यादा खामोशी पढ़ ले, मेरे अनकहे जज्बातों के लफ़्ज़ तुम तक यूँ पहुँचे l जब थक कर हारूँ मैं इस ज़माने की कशमकश से, तब तुम्हारे कंधे पर सिर रख कर मेरी थकान ढल ले। भीगी पलकों और अपनी ही जिद से जब तंग आऊँ मैं, अपनी मौजूदगी से तुम मुझे फिर यूँ ही सँवार लेना। सब चाहे मुझे यूँ ही हँसी और चमक के वास्ते, पर तुम तब भी प्यार करो , जब मैं होऊ उदासी के साथ में l मेरी चंचलता को तुम्हारी संजीदगी का सहारा मिले, जैसे तपती धूप को सागर का किनारा मिले। प्रेम वो नहीं जो दुनिया को दिखे, प्रेम वो जो दो रूहों के बीच चैन बनकर टिके ll
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