राख
बना ये मिट्टी का जिस्म है इसपे क़्या घमंड करता है तु , राख से होकर एकदिन इसे खाक में मिल जाना है , हर जुल्म का हिसाब इस जहां में ही होगा उस जहाँ केवल खाली हाथ जाना है , जब तक दौलत और जिस्म में जान है हर कोई तेरा अपना साथी है , लुट जायेगा जब एक दिन तु अकेले ही आँशु बहाना है, मिट्टी से बना ये हस्ती एकदिन राख में मिल जाना है,
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