अपनी झलक ये जिंदगी
अपनी झलक ये जिंदगी, देख इधर उधर ढूंढा बहुत पर है न साथ खड़ी, खेले लुक्का छिपाई, आंख मिचौली कर मुस्कुराए खड़ी देखे बहुत , न देख से ऐसे दिखा अपनी झलक ये जिंदगी। न जाने कब कहां तुझसे खफा, ये जिन्दगी नही तो समझाए मुझे, मै भी समझाया करता गए पल सब बीत, याद भी य नही कब देखे दिखा अपनी झलक ये जिंदगी । देखा वो राहों में गुनगुनाए पड़ी कुछ आधा तो कुछ पूरा खड़ी बस मुझे बताई पड़ी , नाम जिंदगी सिखाए पड़ी दिखी अपनी झलक जिन्दगी की। (जिंदगी बोले बस सुन बातें मेरी) मैं ही हुं जिन्दगी कभी हसी पड़ी, कभी दुखी पड़ी पर तुझे सिखाया पड़ी न रूष्ट पड़ी, न गैर बनी बस तेरी साथ पड़ी, देखे सपने जो, उस सपने सी मै जिंदगी।
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