मेरा मन चकरघिन्नी पर चढ़ जाता
मेरा मन चकरघिन्नी पर चढ़ जाता है मेरा मन चकरघिन्नी पर चढ़ जाता है और कहीं से कहीं पहुँच जाता है। कभी वो बग़ीचे में चला जाता है और फूलों पर झूले झूलता है। फूलों की ख़ुशबू से वो भीग जाता है, तो मिट्टी की सौंधी खुशबू से महक उठता है। भौरों की गुनगुनाहट से वो हवा में गूंज उठता है, तो पत्तों की खरखराहट से आनंदित हो जाता है। आसमान से उतरकर वर्षा की बूँद बनकर नदियों में बह जाता है, तो कभी तितली के पंख बनकर रंगों में खो जाता है। मेरा मन चकरघिन्नी पर चढ़ जाता है और कहीं से कहीं पहुँच जाता है। — कल्पेश कलाल
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