दो लब्ज़ उनके लिए
कुछ शब्द अकथित रह गये कुछ लब्ज़ अनसुने रह गये । कहना तो बहुत कुछ था उनसे पर वह बिना सुने ही चले गए। यह भी मालूम है की उनको हम उनसे कितने महोब्बत करते हैं । शायद हम ही उनके काबिल नहीं थे जो हम उनको अपना ना पाये । अब इतना कहना है उनसे जहां रहो तुम खुश रहो । क्योंकि पता है तुमको .तुम्हें खुश देखकर अक्सर मेरे इस नाजुक दिल को खुशी मिलती है । चलो माना की हमारी महोब्बत का कर्ज न दें पाये तुम । पर इतना तो करो जालिमा हमारी खुशी का कारण बन पाओ तुम।
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