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ख़त्म गर हो भी जाए, तो सुकून कहा दूर गर निकल भी आए, तो दूर कहा गलतियां ढूंढती हैं जवाब दरख़्त दीवार पुछते है मुझसे कोई भुलैया, मुझे बेबस किए जा रही है हवाएं जकड़ती है यहां, चंचलता रूठ रही मै जो सो भी जाऊं, कब्र सवालों से घिर जाए आखें बंद भी कर लू, तो आशुओ से भीगना होगा परे आसमान में गर सितारे भी मिले, घर भूखा ही रह जाए मैं मुंह फेर भी लू, तो दो चेहरे तकते है मुझको उम्मीदें पैर बंधे, गुल–ए –बाग खिलना होगा देर –सवेर, मुझे जवाब बनाना होगा, कि मुझे मुझसे मिलना होगा।
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