कांच की चूड़ियाँ
वो आए तो सही, हाथों में कांच की चूड़ियाँ लेकर, इक मुद्दत से ठहरी हुई, वफ़ा की निशानियाँ लेकर। "वो जानते थे कि दिल मेरा नाज़ुक बड़ा है, तभी तो आए हैं वो, अपनी मुस्कान में सारा सुकून लेकर।" सुना है कि कलाई पर जब कांच सजता है, तो खामोश धड़कनो में भी एक साज बजता है। वो सतरंगी चमक, वो खनकती हुई सरगोशियाँ, मानो सूखे हुए आंगन में बारिश बरसती है। वो बोले- "ये तोहफ़ा है, मगर संभल कर पहनना, " मैंने कहा - "उम्र गुज़ारी है, ये जफ़ा सहते हुए। टूट भी जाएं तो मलाल कैसा होगा भला? हम तो ख़ुद कांच हुए, उनकी राह तकते हुए।" वो नीली, वो पीली, वो सतरंगी कमानें, जैसे ठहर गए हों वक़्त में, खोये हुए ज़मानें l दरारें अगर पड़ भी जाएं इन कांच की चूड़ियों में, तो हम इन्हीं टुकड़ों से वफ़ा का आईना बुन लेंगे। वो आए तो सही, नंगे पाँव यादों की ज़मीं पर, हम टूटे हुए कांच पर भी, मखमली होकर मिल लेंगे ll
Poetry Books 50% Off
Bestselling collections from top poets
