बेरोज़गारी
बेरोज़गारी लम्बे वक़्त तक चले तो प्रेम पहले चला जाता है, हौसला बाद में। या सब्र पहले जाता है और उसके पीछे-पीछे प्रेम। हौसला फिर रहे न रहे, वह बात नहीं रह जाती। कुछ वक़्त बाद रोज़गार मिल भी जाए, मगर स्नेह छूट चुका होता है। अच्छा, यह नए ज़माने की बेरोज़गारी है, मुझे feminism की तरफ़ से तोहफ़ा है। एक शानदार दिक्कत। ओझी चोटें कैसे आ सकती हैं मेरे हिस्से? तुम्हारे हिस्से ? मुझसे पहली उम्मीद स्नेह की की गई थी। जिस भी चीज़ की आप मांग करते हैं और आपको मिल जाती है, सुना है बाद में वही सूद समेत लौटानी भी होती है। और न लौटाएँ तो? कौन पूछ रहा है? कौन रखता है हिसाब? इन छोटी-छोटी इकाइयों का हिसाब किस बहीखाते में दर्ज है? मेरी तक़लीफ़ मुझे अंधा बनाती है। तुम्हारी तक़लीफ़ तुम्हें बहरा। बस कोई गूंगा नहीं रह पाता। और लफ़्ज़ आसपास की दीवारों को भरते जाते हैं। समीप आती जाती हैं दीवारें, फूलती जाती हैं। इन दीवारों के पेट बड़े होते जाते हैं और फिर खा जाती हैं यही दीवारें सारे मानी। गूंगे मानी, बहरे मानी, अंधे मानी। अर्थ के बिना शब्दों को क्या कहते हैं? कुछ नहीं। मगर हमें तो इश्क़ ने चुना है। जुनून ने गोद लिया है। इस पर सब्र भी अपना सिर पीटता है, थकता है, और फिर चला जाता है। स्नेह मन मसोसकर रह जाता है। तर्क बेजान हो जाते हैं। बहीखाते खो जाते हैं। और रह जाते हैं बस हम । पूरे ब्रह्माण्ड में।
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