जयकरी /चौपई छंद )
शीर्षक :मूढ़ की मानसिकता ( मूढ़ सदा ही सोचे जंग, उसका मानो मन मतिभंग। हरदम रहता चिंता मग्न, रहती बौद्धिक क्षमता भग्न।। सबसे करता वे तकरार, मन में रखता सबसे खार। उर का सदा रहे ये खोट, सज्जन पर ये करता चोट।। रहना ऐसे नर से दूर, सदा अहं में जो है चूर। समझो उसको काला नाग, ऐसी संगति का हो त्याग।। स्वार्थी होते ऐसे मनुज, मानव रूपी मानो दनुज । सद्गुण से रखता परहेज, गलत कर्म में रहता तेज।। आज बहुत हैं ऐसे कोढ़, धवल वस्त्र का चादर ओढ़। पूजा होती उसकी आज, जिन्दा जो है खोकर लाज।। ऐसे लोगों की भरमार, जग में जिसकी जय जयकार। सज्जन रहना है अपराध, वे है चिड़िया दुर्जन व्याध।। नरेंद्र सिंह
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