अनपढ़ मै
अजर है अमर है या है ही नहीं तथाकहित ऐ आत्मा आंखें बन्द कर बस मान लूं या अर्जुन की तरह अपने प्रश्नों से तुम्हे बाध्य करू ए परमात्मा मेरे कई सवाल हैं सच कहूं तो जैसे अनपढ़, जाहिलो सा हाल है अनभिज्ञ हूं मैं इस धरा के एक छोटे कण के अस्तित्व से भी फिर क्यों नही जाता घमंड मेरे मस्तिष्क से अभी आने वाले दो पल का पता नहीं और अगले कई वर्षों की परिकल्पना को सजीव करने का विचार मन मे उधम मचाता है इधर मै भी मै हु की नही जैसा मात्र प्रश्न भी मन समझ ना पाता है
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