फितरत
बातों-बातों में अब तुम्हें लुभाना क्या, काली रातों में चाँद का ज़माना क्या। हर मसले को हम खुद ही हल करें, अपने ग़म में किसी और को फँसाना क्या। रंग चेहरों के हमने भाँप लिए हैं, बेरंग भीड़ में रंग जमाना क्या। कुछ बदली-सी है सियासत की आदत, मोहब्बत-ए-वतन क्या, मादर-ए-तराना क्या। जाँ है जब तलक, दर्द भी साथ है, दर्द छुपाना क्या, दर्द दिखाना क्या। माँ के सजदे की अब कोई ज़रूरत नहीं, अब ईमां क्या, और इबादतख़ाना क्या। कोई बात हो, तो हम बात कुछ कहें, बेवजह तेरे घर आना-जाना क्या। काग़ज़ की है दुनिया, स्याही से रिश्ते, मोहब्बत का कोई और रंग चढ़ाना क्या। राजीव
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