हरकत मेरी जानकर, वक़्त को फरमाय
हरकत मेरी जानकर, वक़्त को फरमाया है नफरत मुझ पर तानकर, रक़्त से गरमाया है खामोश कर खुद को अपनी ही खामोशी से मेरी हरकत जानकर, वक़्त को फरमाया है चापलूसी मेरी वो भूलकर,मुझसे कहलवाया है आदतन लगी वो जुमकर, मुझको को समझाया है दावेदारी वक़्त की मानकर ,वो अपनी फिजा से मेरी हरकत जानकर, वक़्त को फरमाया है गर्मी की मूसलाधार में, पानी मन का बरसाऊंगा सर्दी के विभोर में, गर्मी देख उड़ जाऊंगा करू क्या इस मन के कोप का चिंताओ पर मेरी हरकत जानकर, वक़्त को फरमाया है आया दौर मेहनत का ,बिन फल ले उड़ जाऊंगा राह मेरी सहमत थी, बिन मन के खिल जाऊंगा दावेदारी देख वो मेरी किसी खंडहर में मेरी हरकत जानकर, वक़्त को फरमाया है बिजली इस पर गिरकर,अपनी नियति जगायी है अडचन मन पर रखकर,अपनी सहमति जतायी है मार वक़्त की जितनी पड़े गरमाकर मन कहता है मेरी हरकत जानकर, वक़्त को फरमाया है भरत कुमार सोलंकी
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