"मैं सहज कवि बन जाता हूं"
मैं सहज कवि बन जाता हूं, दुनिया का राज़ बताता हूं, ना धर्म भला, ना जुल्म बुरा, बस तर्कों का भेद बताता हूं, अब हास्य नहीं, वह करुण नहीं, बस उत्साह का भाव बताता हूं, सियासी दल को खेद नहीं, जनता को जिसका बोध नहीं, मैं निर्धन की बात बताता हूं, मैं सहज कवि बन जाता हूं, दफ्तर में बैठे अफसर से, बिस्तर पर लेटे नेता से, मैं कितना कुछ कह पाता हूं, बस बढ़ जाए बेचैनी उनकी, इन शब्दों का जाल बिछाता हूं, मैं सहज कवि बन जाता हूं, संत भी अपने क्षीण हुए, दर्शन से कितने दूर हुए, अब विचारों की पराधीनता में, मैं अदब कहां से पाता हूं, मैं सहज कवि बन जाता हूं, चलो मैं अपनी बात बताता हूं, ये मोबाइल रोज़ चलाता हूं, सिमट गया एक छोटे पर्दे में, क्या कभी ख़ुद से मैं मिल पाता हूं? शेष बचा रहूं मैं अपनों में, हररोज़ दिखाई दूं किताबों के पन्नों में, मैं सहज कवि बन जाता हूं!! –राजू गुजराती
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