मेरे लिए कौन हो तुम!?
कैसे बताऊं देवी! कौन हो तुम? कहने को कुछ नहीं, फ़िर भी मानो मेरा सर्वस्व जहां तुम..... जैसे कृष्ण की गीता तुम, राम की सौम्यता सी तुम, बुद्ध की करुणा तुम, जानकी का त्याग तुम, यशोदा (बुद्ध) सा समर्पण भाव तुम, पद्मिनी सा आकर्षण तुम, लक्ष्मीबाई सा स्वाभिमान तुम, राधा सी निश्चलता तुम, मोहन की मुरली की तान तुम, मीरा के जीवन का सार तुम, दिनकर की रचना उर्वशी तुम, अमृता प्रीतम का हर भाव तुम, कर्ण का रश्मिरथ तुम, अर्जुन सा तेज प्रहार तुम, बनारस का हर इक घाट तुम, वृंदावन का हर इक भक्तिगान तुम, संगम में जैसे बहती गंगा, मेरे ह्रदय में वैसे रहती तुम! प्रकृति में व्याप्त असीम शांति तुम, जीवन को गति देती वो प्राणवायु तुम, दीपक का प्रकाश तुम, एक भटके को मार्गदर्शन तुम, मेरे लिए जैसे अमृतकाल तुम, नियति का सुंदर सा उपहार तुम, मेरे जीवन का सुंदर आयाम तुम, मेरे ह्रदय का सरताज तुम । मेरे अधियारे जीवन का प्रकाश तुम, मेरे लिखने की प्रेरणा का अभिप्राय तुम, मेरे रोम रोम में व्याप्त उस ऊर्जा का संचार तुम, और अन्ततः मेरे ह्रदय से उठती हर ध्वनि की पुकार तुम ।। तुम नहीं जानती तुमने मेरे लिए क्या कर दिया, वर्षों के इस कैदी पक्षी को मानो उड़ने हेतु खुला आसमान ही दे दिया ।
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