मौन अनुरोध
शिकायतें तो बहुत हैं तुमसे, पर अपेक्षाएँ शून्य के कारण, हम अधिकारहीन हैं। अगर मिलेगा मौका माँगने का तुमसे, तो माँगूंगा वो — जो लौटा न सकूं: समय। ये बिना बोले, बोले तो कैसे? ये बिना समझाए, समझाए तो कैसे? कोई आँखों की ज़ुबां हो तो बताए, हम तो समझे, पर उनको न समझा पाए। जानते तो हैं हम भी सब कुछ, पर ख़ुद को ये समझाएं तो समझाएं कैसे? सुनाना और बताना चाहते तो हैं बहुत, पर माना — जो मिला है, वही है सब कुछ। अगर मिलेगा मौका फिर से मुझे, तो काश मैं मौन को भी ज़ुबां दे दूँ। तभी कहीं जाके समझेंगे वो, बिना बोले, बिना देखे, बिना पूछे। कल के लिए कल छोड़ दूंगी क्या? जो बीता है उसका बोझ यहीं छोड़ दूंगी क्या? माना कल का तजुर्बा सिखाता है, पर तजुर्बे को नया तजुर्बा नहीं दोगी क्या? काश अपना कोई होता यहाँ, जो शब्द से ज़्यादा मौन पढ़े, शिकायतों से ज़्यादा स्वीकार करे...! बस अब यहीं ठहरता हूँ मैं, यही है मेरी दास्तान, पढ़ने वाले पढ़ें लफ़्ज़, समझने वाले को भाव । By SHIV | For the Someone (01.07.2025)
Poetry Books 50% Off
Bestselling collections from top poets
