उसका चेहरा
हर रंग से उसका चेहरा बना लेता हूँ कभी सूरज में, कभी चाँद में छुपा लेता हूँ कभी बारिश की बूंदों में महसूस करता हूँ कभी हवाओं से उसकी ख़ुशबू चुरा लेता हूँ वो सामने हो या ना हो, फ़र्क़ क्या पड़ता है मैं तो ख्वाबों में भी उसका हाथ थाम लेता हूँ जिस गली से गुज़रती है उसकी याद, मैं हर मोड़ पर रुक के उसे सलाम करता हूँ खामोशियों में भी उसकी आवाज़ सुनता हूँ टूटी हुई तस्वीरों में उसका राज़ ढूंढता हूँ वो पल जो उसके साथ गुज़रे थे कब के गए, पर मैं हर घड़ी उनमें खुद को दोहराता रहेता हूँ कभी उसकी हँसी में जीता हूँ कभी उसकी खामोशी में रोया हूँ मैं हर लम्हा उसमें कहीं न कहीं जीता हूँ, ना चाहता हूँ, ना भूलता हूँ… बस उसे महसूस करता हूँ मैं हर रंग से उसका चेहरा बना लेता हूँ उसका चेहरा बना लेता हूँ.............
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