प्रकृति गीत
प्रकृति को मत छेड़, रे बन्दे प्रकृति को मत छेड़। अगर रूठ गई यह तो, करेगी अति बखेड़ ,रे बन्दे प्रकृति को मत छेड़।। नदी विलुप्त किया, पर्वत काट दिया अरण्य उजड़ गया पेड़ सब छँट गया, ठाना इससे वैर,रे बन्दे प्रकृति को मत छेड़। जब तक सोई है रानी, तब तक तेरी है कहानी, अति पर नहीं तेरी खैर,रे बन्दे प्रकृति को मत छेड़।। महल अटारी खूब बनाया, नित नूतन तू नगर बसाया, कब तक चलेगा हेर-फेर,रे बन्दे प्रकृति को मत छेड़। जीना हो रहा है मुश्किल, आशाएं हो रही धूमिल, विपत्तियां रही हैं घेर, रे बन्दे प्रकृति को मत छेड़।। गर्मी अब खूब झुलसाए, बाढ़ सुखाड़ आफत लाए, भविष्य दिख रहा अंधेर,रे बन्दे प्रकृति को मत छेड़। बचे नदी पर्वत जंगल, बून्द-बून्द बचाओ सब जल अब तनिक मत कर देर,रे बन्दे, प्रकृति को मत छेड़। सुन लो सब बातें मेरी, प्रकृति को न समझो चेरी, यह बदला ले रही देर-सवेर,रे बन्दे प्रकृति को मत छेड़। प्रकृति को मत छेड़ ,रे बन्दे प्रकृति को मत छेड़।। नरेंद्र सिंह
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