कृष्ण जन्माष्टमी
जन्म का समय नहीं स्वयं समय ही तो जन्मा था धर्म की रक्षा करने को स्वयं धर्म ही तो जन्मा था प्रकोप था वो कंस का धरा पर अधर्म छाया था लेकिन कमलनयन के नयनों से अधर्म कहां बच पाया था प्रेम की परिभाषा क्या है ये जग को समझाना था इसीलिए कन्हैया के संग किशोरी को भी आना था सारे जग के जगतपिता कन्हैया बन कर आते हैं मैया की गोद में कान्हा मंद मंद मुस्काते हैं डांट पड़ी अब मैया से तूने हरि के भोग क्यों खाए हैं कौन बताए यशोदा रानी, तेरी गोद में स्वयं हरि ही तो आए हैं आदेश हुआ जब मैया का, ओखली से बंध जाते हैं वही कन्हैया रण भूमि में, विश्व रूप दिखलाते हैं जब जब धरा को हानि होगी, हरि सदैव आएंगे सम्भवामि युगे युगे के वचन को कृष्ण सदैव निभाएंगे
Ad
Poetry Books 50% Off
Bestselling collections from top poets
Shop Now →
