मेरी कल्पना
बचपन से मैं एक तस्वीर बनाती थी उस तस्वीर में था कौन ये मुझे कोई खबर नहीं थी मेरी कल्पना थी या मेरी सोच या मेरे हाथों की कला न उसे कभी देखा न कभी जाना सोचती थी कि क्या ये इस दुनिया में होगा भी या सिर्फ़ मेरी कल्पनाओं में है न कभी सपनो में उसने दस्तक दी न कभी आके मुझसे टकराया फ़िर अचानक एक दिन कुछ अलग हुआ सफ़र में मुसाफ़िरो का मिलना सुना था मुझे मेरी कल्पना मुसाफ़िर बनके मिलेगी ये खबर कहा थी सामने बैठा था वो मेरी तस्वीर से निकल कर बोलना चाहती थी बहुत कुछ पूछना चाहती थी बहुत कुछ कौन हो तुम क्यों मेरे तस्वीर में आते हो कौन हो तुम क्यों मैं तुम्हे इतनी अच्छे तरह से बिना देखे ही जानती हु न जाने कितने सवाल और कितनी बाते लेकर मन में मैं शांत बैठी रह गई वो दूर जाता रहा और मैं सिर्फ़ देखती रह गई सामने से उठकर फिर से उसने अपनी जगह ले ली और फिर मेरी कल्पना मेरी तस्वीर में ही रह गई
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