बेज़ुबान नारी की ज़ुबान
द्वार जो खटखटा रही है, बंधी हुई वो हवा हूं मैं | चीखने को जो बेसबर है, दबी हुई वो आवाज़ हूं मैं | चार दीवारों से मुझे बांध लिया, ज़मीन छीन ली ना आसमा दिया | जिसका हक तुमने छीन लिया है, वो बेज़ुबान नारी हूं मैं | मुझे आसमान पर बादल नही, मेरे हिस्से का पूरा आसमान चाहिए | मुझे जमीन का कोई टुकड़ा नही, मेरे हिस्से की पूरी जमीन चाहिए | एक बारी जो उड़ जाऊं, किसी ऊंचाई पर ना रुकूंगी मैं | जब तक तारे सारे ना बटोर लूं , तब तक न रुकूंगी मैं
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