पंछी
अब वो पिंजरा खुद गया है , पर पंछी उड़ना भुल गया है । भुल गया है , पंखों को फैलाना बेपरवाह होकर खुले आसमां में उड़ जाना । भुल गया है , कैसे जोश से आसमां को नापते हैं , कभी पेड़ो पर घोंसलो में तो कभी किसी रोशनदान से झांकते हैं । हां........ पिंजरा तो खुल गया है पर पंछी उड़ना भुल गया है।।।..
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