लकीर का फकीर नहीं हूं मैं
मन में उठने वाले उद्गार को आखिर कैसे न उकेरूं बलवती भावना को आखिर कैसे मैं रोकूँ मनोवेग को रोकना आसान भी तो नहीं होता उसे तो फूटना ही है प्रवाहित होना ही है उसे भला कोई सीमाएं रोक सकती हैं क्या? दिल की प्रस्फुटित भावनाएं किसी नियम के मोहताज बिल्कुल नहीं होती हैं । मत ढालो अपनी भावनाओं को किसी पुराने सांचे में उसे बहने दो अविरल अपनी मौलिकता के साथ। नरेंद्र सिंह 02.04.2024
Ad
Poetry Books 50% Off
Bestselling collections from top poets
Shop Now →
