मां रोती है अक्सर...
मां रोती है अक्सर.... कभी स्नेह में निर्झर, व्यथित होकर कभी मन, कभी सावन कभी पतझड़, मां रोती है अक्सर। क्षुधा का वेग प्रखर, दुग्ध भी न हो मयस्सर, शिशु के लिए प्रतिपल, मां रोती है अक्सर। पति दायित्व से यदि विरत, गृहस्ती खींचने को होकर विवश, सर पर ईंट गारों की डलिया रख, मां रोती है अक्सर। संतान जब भी हो विकल, चुभ जाए कभी कंटक अगर, दवा , दुआ व मानकर मन्नत मां रोती है अक्सर। सब कुछ ताक पर रखकर, औलाद की हर पूर्ति की खातिर, दुनिया से अकेले ही लड़कर, मां रोती है अक्सर। स्वयं को निष्प्रयोज्य कर, बहू बेटे को गृहस्थी सौंपकर, वृद्धाश्रम के किसी स्तंभ को आलंब कर, मां रोती है अक्सर। - डॉ कौशलेंद्र विक्रम सिंह
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