राह
मैं ढूँढ रही हूँ राहें मौत की, जो दे मुझे मंजिल सुकून का, जहाँ न हो फरेब का आँगन, ना कोई मजबूरी हालात का, मुझे कर देना है माफ़ सबको, मैं खुद से नाराज़गी चाहती हूँ, हाँ है हर गुनाह बस मेरा ही, मैं इस जीवन से आजादी चाहती हूँ, मुझे मिले जितने भी हमराह, इस राहें ज़िंदगी में हरदम, सबके सब थे लाजवाब मगर, मुझमें ही नहीं थी कोई दमखम, मैं अब सोना चाहती हूँ, मैं नींद में खोना चाहती हूँ,, नहीं है मुझे मुस्कुराने की आरजू, मैं खुलकर रोना चाहती हूँ।
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