विलुप्त परम्परा
हियं अपार कोड छावतो, होळी रो तिंवार आवतो मन म बहोत तरंगा छाती, जद लाछड़सर म गींदड़ होती। पन्न बाणिय रो नाच निराळो, आधी रात बालाजी आणो जनता बड़ चाव सु जोती, जद लाछड़सर म गींदड़ होती।। अगुणिय टाडाळी बैंक सामान, चानणौ हो तो आसमान म मीठा ढोल साग बंसरी बाजती, जद लाछड़सर म गींदड़ होती।। ओढ़ ओढ़णी मेहरी बनता, धोती कुरता बोरी ओढ़ता गजब कई नौटंकी होती, जद लाछड़सर म गींदड़ होती।। कुणगी जाण निजर लाग गी, परंपरा गांव सु भाज गी याद करा जद मनडो रोव, गांव म अब गींदड़ क्यूं कोनी होव।। परंपरा जब लुप्त होती है ,तो सभ्यता अकेलेपन का शिकार हो जाती है- रामधारी सिंह दिनकर
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