वीर गाथा
कुछ खौलती नसों के साथ , धड़क रहे जो धड़कने वो सह रहे हर गोलियां वतन पर दिल जो हारे है , हर खून की , हर दर्द की , हर चोट की ललकार है , पर सुन न पाओगे तुम कुछ, क्योंकि सहने वाला मौन है। हर आंसू में , हर घाव में , हर रोम में एक जीत है , हर बह रहे लघु की अपनी खूबसूरत एक रीत है । इस मन के जो , दर्पण में जो , चल रही एक जंग है की हस कर वतन पर जान छिड़कने वाला कितना वीर है, वे वीर है , वे धीर है , बदलाव की लकीर है , वे देश सेवा को समर्पित , गरजते कर्ण की तीर है । वतन के प्यारे , जग को न्यारे , जब तुम लिपट कर आओगे , तेरी कफ़न पर चढ़ा यह झंडा , कर्ज के आंसू बहाएंगे तेरी मां के बह रहे हर आंसू फिर आकर तुझे दुलारेंगे , तुझे सिर्फ एक झलक ही देख कर फिर अलविदा कह जाएंगे ।
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