आस्तीन का सांप
मीठी छोरी ने ऐसा फसाया अपनी चिकनी चुपड़ी बातों में कि आंखे खुली की खुली रह गई और मन चारो काने चित्त हो गया। एक वक्त पर जो बना था सबकी आंखों का तारा वक्त आने पर ऐसा हुआ नौ दो ग्यारह कि दिल के दांत खट्टे हो गए। तिल का ताड़ बना और हम हाथ मलते मलते पूरा पानी का डेढ़ बने। पर पासा पलटकर जब वो आया अपने मगरमच्छ के आंसू लिय उल्टे हाथ वापस आया हमने भी जीत की प्यास लिए मैदान मार ही दिया।
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