"स्त्री"
एक स्त्री का "स्त्री" होना वरदान होता है - उसके पिता के लिए कि सबसे अधिक प्रेम वो उसी से पाता है... उसकी मां के लिए की हर सुख- दुख वो उसी से बांटती है... उसके पति के लिए कि वो उसकी हर जरूरत को पूरा करती है ,ख्याल रखती है उसके परिवार का... उसकी सास के लिए कि अब घर का काम वही तो संभालेगी बहू बनकर... उसके ससुर के लिए की अपने पिता की तरह उनकी भी सेवा करेगी... एक स्त्री का स्त्री होना मगर अभिशाप होता है "स्वयं" के लिए जीवन भर लड़ती रहती है अपने ही अस्तित्व के लिए वह अपना वजूद ढूंढती है - कभी अपने पिता की आंखों में... कभी मां की सीख में... कभी पति के प्रेम में... कभी सास के रुआब में... कहने को दो घर होते हैं उसके मगर पूरा अधिकार वह एक पर भी नहीं पाती भोर से सांझ तक बदहवास सी, सब की जरूरतो को पूरा करती, अपना फर्ज निभाती.. प्रेम को टटोलती.. अपना अस्तित्व तलाशती... थककर सो जाती है, उठकर अगली सुबह, सब की जरूरतों को पूरा करने के लिए..!
Poetry Books 50% Off
Bestselling collections from top poets
