कलयुग है
तुलसी दास की आत्मा , रो रही है आज जार -बेजार; आज के कलुयग में देखकर , क्षत्रियों के अजीब व्यवहार। रघुकुल रीत की बात तो, अब हो चली है विपरीत; दारू के आगे भाड़ में जाए, क्षत्रिय वचन,हित और मीत। अस्त्र शस्त्र सब छूट गए, छूटे उत्तम शिक्षा ,संस्कार; खेत बेचकर करे दिखावा, समाज का भविष्य अंधकार। नरेंद्र सिंह 08.12 .2023
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