आंखों में चुभता रहूं
मैं बेच दूं अपने उसूल ये मुमकिन नहीं,बेहतर है मुसलसल कुछ आंखों में चुभता रहूं। इस हवाओं ने भी तय कर रखें है रुख अपने,बेहतर है बेरुखी की इन हवाओं में भी डटा रहूं। की तोड़ दूं ये उसूल जिस दिन गर बेहतरी के लिए,क्या मै खुद से ही खुद को पूछता रहूं? चल दिया हु जिस ओर क्या अब धाराओं की परवाह करूं?, क्या अनुकूल में क्या विपरीत में, उसी रस्ते मैं डटा रहूं। जग रूठे या फल छूटे, किंचित नहीं परवाह मुझे, कुछ बंधनों के लिए मै क्यों कुछ उपकार सहूँ? हम ऐसे पंछी नहीं जो उड़ना छोड़ देंगे, ऐसे नाविक नहीं जो तैरना छोड़ देंगे, हिम्मत नहीं हारेंगे हम नया आसमान ढूंढ लेंगे। ये आसमा भी गर छूट जाए तो क्या? नया जमाना ढूंढ लेंगे, हौसले हमारे आज भी जिंदे है नया ठिकाना ढूंढ लेंगे। मैं बेच दूं अपने उसूल ये मुमकिन नहीं,बेहतर है मुसलसल कुछ आंखों में चुभता रहूं। रचना: @जीतेश
Poetry Books 50% Off
Bestselling collections from top poets
