वक़्त
दिन पर दिन सुबह से शाम बीत रही उमरिया जैसे खाली जाम। न खुमार न कोई नशा प्याला खाली हो रहा साकी बेअसर हो रही शाम बिता जा रहा। न मादकता न बेहोशी है ये कशमकश न जाने कैसी है मुझे पीने का सलीका नहीं या ये महफिल यारों झूठी है। बीत जाएगी शाम तो पछतावा होगा शमा बुझ जाएगी मुझे जाना होगा । वक्त कम है सलीके से अब पीना होगा मैखाने से जाने से पहले इत्मीनान करना होगा।
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