चेहरा और सोच...
– शब्दवेडा संतोष राऊत चेहरा हँस रहा था, पर आँखें कुछ और कह रही थीं, भीड़ में वो ख़ामोश था, पर सोचें शोर कर रही थीं। हर मुस्कान सच्ची नहीं होती, ये अब समझ आया है, चेहरे बदलते रहते हैं, पर सोच ही असली साया है। लोग लफ्ज़ों से खेलते हैं, दिल की बात छुपा लेते हैं, और हम बस चेहरों को पढ़कर, रिश्ते बना लेते हैं। वो जो कम बोले, जरूरी नहीं कि अनजान हो, शायद उसकी सोच गहरी हो, और वो बहुत परेशान हो। अब चेहरों की नहीं, सोच की पहचान जरूरी है, क्योंकि असली इंसानियत, भीतर की रोशनी से पूरी है।
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