समय से परे चल रही कथा निराली। सुकून से बहते नदी को मरोड़के सुखा देता है इंसान स्वार्थी। उस बंजारे जमीन पर अपने जीत का झंडा लहराके बनते है इंसानियत के मर्सिया।