“तेरी तलाश में”
मैं भटकता हूं हर रोज तेरी तलाश में, कहीं दरिया मिल जाए मुझे, तपते रेगिस्तान में, और अब ठहर जाऊं बीच रास्ते में ही कहीं, इत्तेफाक से तू मिल जाए मुझे, मेरी तलाश में.... ये खामोशी रोज दफनाती हे मुझे,तेरी तलाश में, सोचता हूं कभी ना बिखरे वह तस्वीर बन जाऊं, तेरे मासूम चेहरे की..... तुझको पाकर मैं कई शहरों की गलियों में बिक जाऊं, तेरी तलाश में..... उजड़ी हुई हे हस्ती मेरी, तेरी तलाश में, रूठा जो मुझसे कहीं बरसों से ये सवेरा, अब मेरे ख्वाबों के शहर में कभी उजाला नहीं होता, बड़े जो कदम तेरी खुशबू की तरफ, खिड़की से कहीं इतराता चांद दिख जाए मुझे, तेरी तलाश में..... अब ये बेख्याली सताती हे मुझे, तेरी तलाश में, मिलता जो हर शाम तन्हा तेरी यादों के किनारे, अब मेरा खुद में बसेरा कहां होता है....? बहक जाया कर सावन की हवाओं में तू कभी, छूकर खुशबू को तेरी मैं गुजर जाऊं उम्र भर के लिए, तेरी तलाश में.....!! – राजू गुजराती
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