मैं और मेरा खालीपन
वो जो एक कमरे के कोने में, साए की तरह रहता है, वो जो बिन बोले ही मुझसे, सब कुछ कह देता है। जब महफ़िलें सो जाती हैं और चिराग़ बुझने लगते हैं, तब मेरे सिरहाने आकर, वो आहिस्ता से बैठता है। वो पूछता है मुझसे— "ये जो तुम मुस्कुराते हो, किसके लिए आँखों में नमी छुपाते हो? ये जो दिन भर की भाग-दौड़ में खुद को खो देते हो, रात को मेरे पास ही लौट कर क्यूँ आते हो?" मैं कहती हूँ— "तू ही तो है जो मुझे मुझसे मिलाता है, वरना ये ज़माना तो बस चेहरा देख कर चला जाता है। तेरे साथ न कोई मुखौटा है, न कोई बनावट है, तू वो आईना है, जिसमें रूह का हर दाग नज़र आता है। तू उन रास्तों की बात करता है, जहाँ हम मुड़ न सके, उन परिंदों का ज़िक्र करता है, जो चाह कर भी उड़ न सके। हम घंटों बैठते हैं, बिना किसी लफ़्ज़ के, बिना किसी शिकवे के, बिना किसी तंज़ के। सन्नाटा जब गहराता है, तो संगीत बन जाता है, मेरा हर एक खाली कोना, एक नई कहानी सुनाता है। लोग कहते हैं— "अकेलापन बुरा होता है," पर ये खालीपन तो एक गहरा समंदर होता है।. "शायद ये खालीपन ही है, जो मुझे पूरा करता है, वरना भरी हुई दुनिया में तो, हर कोई अधूरा रहता है।"
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