आरज़ू
धरती और आसमां हैं कितने पास— कि जुदा होते नहीं हैं। शमा की उल्फ़त में जल जाते हैं परवाने, मगर कभी रोते नहीं हैं। नींद के दीवाने क्यों अब तेरी आरज़ू में सोते नहीं हैं? सुख, चैन, शराफ़त, इबादत—सब गँवा दिया, इक तेरी याद है—जिसे कभी खोते नहीं हैं। क्यों अब किसी और के होते नहीं हैं? और तेरी चाहत से—कोई समझौते नहीं हैं। डर है कि खो न दूँ तेरी साँसों की खुशबू, जब लगे थे गले तुम मुझसे, उन कपड़ों को भी हम अब धोते नहीं हैं। धरती और आसमां हैं कितने पास— कि जुदा होते नहीं हैं। _ S.Bhatt
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