छंद-- विष्णुपद*
पदांत- एक गुरु आवश्यक (112) यति-- 16,10* शीर्षक-- झूठे सब सपने। जग है सारा ममता माया, जितने हैं अपने। रिश्ते-नाते जाया-काया, झूठे सब सपने।। संकट पर ये काम न आते, सभी दगा करते। पैसे के हैं भूखे लोभी, रूप विविध धरते।। पैसा फेंको नाटक देखो, नाम लगे जपने। रिश्ते-नाते जाया-काया, झूठे सब सपने।। नगरी यह है क्षणिक ठिकाना, उधार जीवन है। त्यागो सब छल अपने उर से, क्षण भंगुर तन है।। सदा ईश पर ध्यान रहे रत, मन को दो तपने। रिश्ते नाते जाया काया, झूठे सब सपने।। आँखें अपनी खोलो देखो, दुनिया दुष्कर है। आस-पास जो रहे साथ में, समझो तस्कर है।। भजो सिर्फ प्रभु को बाकी तो, कहने को अपने। रिश्ते-नाते जाया-काया, झूठे सब सपने।। जग है सारा ममता माया, जितने हैं अपने। रिश्ते-नाते जाया-काया, झूठे सब सपने।। नरेन्द्र सिंह
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