विधाता छंद
जगत मिथ्या भजो प्रभु राम को नर तुम, यहाँ सब मोह-माया है। सभी है स्वार्थ में डूबे, नहीं अपना पराया है।। जहाँ पर लाभ दिखता तब, टिके रहता वहाँ लोभी। सदा चिपके वहीं रहता, अगर उम्मीद हो जो भी।। बने जब कार्य बंदे का, वहाँ से फूट ही लेता। बहुत खोजो उसे पर वह,नजर शायद कभी देता।। करो तुम नेक कर्मों को , वही तो काम आएगा। अभी से त्याग दो छल बल, नहीं ये साथ जाएगा।। तजो सब मोह को अब तो, छली है ये जगत सारा। वही तो एक हैं अपना, शरण उनकी गहो यारा।। पड़े हो व्यर्थ माया में, पराया कौन अपना है। उठो जागो सभी हे नर, भ्रमित संसार सपना है।। नरेन्द्र सिंह
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