फ़ना
किसी की रहनुमाई क्या, ख़ुद ही मेरा सफ़र है, मिरी तलाश का आईना, सदा मेरा सफ़र है। जहाँ के झूठ हर पल मुझे गिरफ़्तार करते हैं, मगर हक़ीक़तों से रूबरू, मेरा सफ़र है। न ताज-ओ-तख़्त चाहा मैंने, न दौलत की ख़्वाहिश, फ़क़त उदासियों का सिलसिला, मेरा सफ़र है। मैं अपने ज़ख़्म ओढ़े हूँ, मैं अपने दर्द पीता हूँ, अजीब-सी तसल्ली का नशा, मेरा सफ़र है। हँसा सदफ़ ये सोचकर कि किस तरह कटेगी उम्र, न तमन्ना न कोई ख़्वाब, फ़ना मेरा सफ़र है।
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