मैं लड़का हूँ
पैदा लेते ही मेरे खुशियां सा छा जाता है, कोई चूमते पांव मेरे तो कोई लाड़ लड़ाता है.. एक दौर बीतता उम्र का तो सब कुछ बदल सा जाता है, कल तक तो लाडला था घर का अब जिम्मेदार कहलाता है.. खो जाता वो लाड़,प्यार सब आता दौर जवानी का, बदल जाता है किरदार तब अपनी ही कहानी का.. घर से लेकर बाहर तक का बोझ लिए मुस्काना होगा, लड़का हो तुम मत भूलो उसका फर्ज निभाना होगा.. कभी जो आए आंसू तो तिनके का देना बहाना तुम, बहन को है उम्मीद बहुत भाई का फर्ज निभाना तुम.. पिता कहते हैं बड़े हुए अब कब तुमको समझ ये आएगा, ऐसा चलता रहा भला तो कौन तुम्हे ब्याहेगा.. तनिक भी चूक हुई तुमसे तो किए जाओगे तुम बदनाम, नाकारा,निकम्मा जैसे अनगिनत होंगे तेरे नाम.. लंबी कोठी गाड़ी बंगले से होती यहां पहचान, चाहे उसे हासिल करने में क्यों ना हो तेरा काम तमाम.. बस इन्ही जरूरतों के खातिर दर दर की ठोकर खाता हूं. ऐसे ही नहीं साहब मैं लड़का कहलाता हूं..!!
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