आजकल दोस्ती कुछ ऐसी है
ज़रा सी बात कह गए वो ज़रा सी बात पर हम नाराज़ क्या हुए वो आ गए औकात पर तुम तो ख़ुद को दोस्त कहते थे न,फिर क्या हुआ तुम्हें तुम भी जश्न मनाने आ गए, मेरी मात पर हम तो वो थे जो दोस्ती में छोड़ दें सिंहासन सोने का तुमने ख़ुद को लुटा दिया,नाहक सी खैरात पर तुमको मेरे हाल पर शोक मनाना चाहिए था तुम फ़र्क बताने आ गए, तेरी मेरी जात़ पर (जात़= identify) तुमको सबसे ख़ास बताया दुनिया को तुमने भी ताना मार दिया अब क्या पास रखें,क्या याद करें, क्या गुरूर करें तेरी किसी सौगात पर तुमने शायद जाना ही नहीं दोस्ती के उसूल को वरना हंस के भुला देते मेरी हर एक भूल को तुमको अपना समझ के सब बताया तूने ही कीचड़ उछाल दिया क़िरदार पर, वो राज़ भला क्या राज़ रहेगा जो रह न सका अपने यार पर सारा जहां खफा हो जाए,चाहें हो परिवार ही कोई भला फिर जाए कहा जब छोड़ दे अपना यार ही दोस्ती है तो दोस्ती रखो भी, केवल नाम न करो निभा न सको तो छोड़ दो वगरना "दोस्ती" को बदनाम न करो अरुण सर्वेश
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