त्रिभंगी छंद
हे दशरथनंदन, हे रघुनंदन,हे दुख भंजन, सुखदायी । कौशल्यानंदन, हर उर स्पन्दन, कष्ट निकन्दन, अहिशायी।। हे शतदल लोचन, तू दुखमोचन, हे रामलला, वनगामी। जगत के नाथ हो, मुझे साथ दो, हाथ थाम लो, हे स्वामी।। मारक खरदूषण, रघुकुल भूषण, मंगल मूरत, बिघ्न हरे। सज्जन प्रतिपालक, दुर्जन घालक, जन हितकारी, मग्न करे।। शबरी को तारा, संत उबारा, आजानुबाहु, अवतारी। अवध के दुलारे, सबके प्यारे, मुझे उबारो, बलिहारी।। तू मुरलीधारी, कृष्ण मुरारी, तू चक्र पाणि, त्रिपुरारी। हे संकटहर्ता, पालनकर्ता, हे सुखकारी, गिरधारी।। गोविन्द गोपाल, तू नन्द लाल, गोकुल वासी, जग भर्ता। हे घट-घट वासी, तू अविनाशी, सर्वव्यापी,दुख हर्ता।। नरेन्द्र सिंह. 14.04.2025
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